Sunday, 25 January 2026

मधुर आवाज़, कोमल भावों के शायर ताहिर फ़राज का मुंबई में निधन, प्रशंसकों में शोक


 रामपुर। प्रख्यात शायर ताहिर फ़राज़ के निधन की खबर से शोक की लहर दौड़ गई है। 72 वर्ष की उम्र में उन्होंने मुंबई में आखिरी सांस ली। उनके परिवार में पत्नी के अलावा तीन बेटियां और एक बेटा शामिल हैं। 29 जून 1953 को बदायूं में जन्मे ताहिर फ़राज़ अपनी मधुर आवाज़, कोमल भावों और आध्यात्मिक रंग से काव्य जगत में एक उज्ज्वल सितारे की तरह चमकते रहे।

सीने में हुआ था तेज दर्द
वह पिछले सप्ताह अपने परिवार के साथ शादी समारोह में शामिल होने मुंबई गए थे। शनिवार सुबह उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन वह बच नहीं सके। ताहिर फ़राज़ ने बहुत कम उम्र में ही कविता और शायरी लिखना शुरू कर दिया था। थोड़े ही समय में वे देश के नामचीन कवियों और शायरों में से एक बन गए।

प्रशंसकों में शाेक की लहर
सौलत पब्लिक लाइब्रेरी सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य काशिफ खां ने ताहिर फ़राज़ के निधन पर शोक जताते हुए बताया कि ग़ज़लें हों, भजन हों, नात हों, सलाम हों या मनक़बत हों, उनकी विशिष्ट शैली, जोश और संगीतमयता ने हर वर्ग के श्रोताओं के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। गायन में उनका कोई सानी नहीं था और खानक़ाह नियाज़िया बरेली से उनके जुड़ाव ने उनकी कविताओं को आध्यात्मिक गहराई प्रदान की।

मुंबई में ही अंतिम संस्कार की तैयारी
ताहिर फ़राज का अंतिम संस्कार मुंबई में ही किए जाने की तैयारी हो रही है। उन्होंने बताया कि ताहिर फ़राज़ का निधन केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि एक पूरे युग का, एक सांस्कृतिक आवाज़ का और उर्दू कविता के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है। उनके निधन से ग़ज़लें खामोश हो गई हैं और शब्द अनाथ हो गए हैं।

उर्दू शायरी के संसार में ताहिर फ़राज़ का नाम एक ऐसी आवाज़ के तौर पर याद किया जाएगा, जिसने ऊँची आवाज़ के बजाय ठहराव और संवेदना को चुना। उनकी शायरी में मोहब्बत, दर्द और इंसानी रिश्तों की नर्म परछाइयाँ साफ़ दिखाई देती हैं। ताहिर फ़राज़ उन शायरों में थे जिनकी पंक्तियाँ मंच से ज़्यादा दिलों में जगह बनाती थीं। उनके अशआर आम पाठक की ज़िंदगी से सीधे संवाद करते हैं। उर्दू साहित्य में उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करता रहेगा। 

उनकी एक ग़ज़ल - 

जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी
तेरी आँखों में भी थोड़ी सी नमी रह जाएगी

सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को
फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी

ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार
घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी

क्या ख़बर थी आएगा इक रोज़ ऐसा वक़्त भी
मेरी गोयाई तिरा मुँह देखती रह जाएगी

वक़्त-ए-रुख़्सत आएगा और ख़त्म होगा ये सफ़र
मेरे दिल की बात मेरे दिल में ही रह जाएगी

- Legend News

Sunday, 4 January 2026

नागरी प्रचारिणी सभा ने 'गुम' हो रही किताबों को दिया 'नया जीवन', रामचंद्र शुक्ल की कविता में हजारी प्रसाद का करेक्शन भी पढ़ने को मिलेगा


 किताबों का साथ न सिर्फ आपके अकेलेपन को दूर करता है, बल्कि आपके ज्ञान स्तर को भी बढ़ाता है. किताबें यदि दोस्त बन जाएं, तो फिर हर मोड़ पर इसका लाभ मिलता है. पुराने वक्त के साहित्य, उपन्यास और कविताएं जो समय के साथ कहीं गुम होती जा रही थी, उन्हें फिर से नया जीवन मिला है. इन किताबों को पुनः प्रकाशित कर लोगों तक पहुंचाया जा रहा है. आज हम ऐसी ही कुछ यूनिक किताबों पर चर्चा करेंगे. जिन्होंने पुनः प्रकाशित होने के बाद काफी सुर्खियां बटोरी हैं.


यह यूनिक और नया प्रयास बनारस की सबसे पुरानी और हिंदी खड़ी बोली में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली संस्था नागरी प्रचारिणी सभा ने किया है. सभा ने आज भी सैकड़ों हस्तलिखित पन्नों, पांडुलिपियों और बड़े-बड़े कवियों, साहित्यकारों और संतों की लेखनी को संरक्षित रखा है. इन दुर्लभ लेखनी को नागरी प्रचारिणी सभा लोगों तक पहुंचा रहा है.



पुरानी किताबों को किया गया रिपब्लिश : हाल ही में सभा ने कुछ पुरानी लिटरेचर और अन्य महत्वपूर्ण किताबों को रिपब्लिश किया गया है. जिसने पब्लिशर के बीच एक चर्चा के साथ ही कंपटीशन का माहौल भी बना दिया है. पहली बार विदेश की तर्ज पर ऐसी किताबें तैयार हुई हैं जो न सिर्फ उसके ओरिजिनल लेखक के ओरिजिनल हस्तलिखित दस्तावेजों को समेटे हुए है, बल्कि उन किताबों में हुए करेक्शन के दौरान लगाए गए लाल निशान के उचित तथ्यों को भी साथ लेकर बाजार में उपलब्ध हैं.


जीर्ण-शीर्ण हो गई थीं पांडुलिपियां : नागरी प्रचारिणी सभा के वर्तमान प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया, सभा में वर्तमान समय में एक दो नहीं, बल्कि सैकड़ों ऐसे हस्तलिखित दस्तावेज और पांडुलिपियां मौजूद हैं, जो समय के साथ बेहद जीर्ण-शीर्ण हो गई थीं. सभा की लंबी लड़ाई और कुछ पुराने लोगों संग कानूनी जद्दोजहद के बाद जब इस स्थान की कमान उन्हें मिली, तो पता ही नहीं था कि यहां ऐसी चीज हैं, जो संरक्षित और सुरक्षित करने के साथ लोगों तक पहुंचाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा.


तीन साल पहले शुरू किया रिपब्लिश करने का काम : व्योमेश शुक्ल बताते हैं, बहुत से लोग होते हैं जो चीजों को सुरक्षित तो करते हैं, लेकिन दूसरों तक पहुंचा नहीं पाते, जिसका लाभ ना उसे तैयार करने वाले को मिलता है और ना ही लोगों को. ऐसी स्थिति में गोस्वामी तुलसीदास, जायसी, मुंशी प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, कबीर, सूरदास और तमाम ऐसे लेखक, साहित्यकार, संतों की लिखी किताबों के पुनः प्रकाशन का काम सभा ने लगभग तीन साल पहले शुरू किया.


नए रूप में किया गया पेश : उनका कहना है कि सबसे पहले हिंदी साहित्य का इतिहास जो सिविल सर्विसेज से लेकर तमाम हिंदी के प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण किताब मानी जाती है उसका पुनः प्रकाशन किया. पांडुलिपियों को असाधारण सांस्कृतिक महत्व माना जाता रहा है, लेकिन वह लोगों तक पहुंच में नहीं थी. बदलते समय और युवाओं की सोच, उनकी पसंद को पांडुलिपियों के नए रूप में पेश किया गया, जिससे पांडुलिपियों और ओरिजिनल लेख उनके दिलों को छू सके.


रामचंद्र शुक्ल ने 24 साल की उम्र में लिखी थी कविता क्या है? व्योमेश शुक्ल बताते हैं, इनमें एक है कविता क्या है? आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हाथों का लिखा हुआ एक निबंध है. हिंदी साहित्य के मूर्धन्य लेखक रामचंद्र शुक्ल का जन्म 1884 में हुआ लेकिन, उन्होंने निबंध का पहला हिस्सा 1908 अपने 24 वर्ष की उम्र में पूरा किया और इस निबंध का अंतिम प्रारूप 1930 में छपा यानी जब उनकी उम्र लगभग 46 वर्ष थी. उन्होंने एक ही निबंध को अलग-अलग रूप में लिखा और उसे अलग-अलग पब्लिशर्स से प्रकाशित करवाया. लगभग 22 -23 वर्ष की अपनी यात्रा में उन्होंने एक निबंध को चार बार लिखा.


एक ही कविता कई बार लिखी : उन्होंने कविता क्या है? जैसे सवाल को भारतीय समाज और हिंदी भाषी लोगों के लिए कई बार लिखा, इसमें कुछ परिवर्तन भी बताएं कि समय के साथ कैसे चीज बदल रही है. इसका एक प्रारूप उपलब्ध है जो लोग पढ़ रहे थे, बाद में सभा को धीरे-धीरे तीन और प्रारूप मिले जिनके हस्तलेखों को सुरक्षित रखने वालों ने एक बड़ा काम किया. हमने इन आर्काइव्स में रखी इन हस्तलेख निबंधों की श्रृंखला को एक साथ एक किताब में लाने का काम किया.


करेक्शन को भी किया गया है प्रकाशित : व्योमेश शुक्ल बताते हैं, 24 साल की उम्र में रामचंद्र शुक्ल ने सरस्वती पब्लिशर्स के पास अपनी कविता भेजी. उस वक्त के संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी थे. महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम साहित्य जगत में बड़ा था. उन्होंने इसकी प्रूफ्ररीडिंग की. जिसमें काफी गलतियां मिलीं. उन गलतियों और महावीर प्रसाद द्विवेदी के लगाए गए लाल निशानों के साथ किए गए करेक्शन को भी हमने किताब में हूबहू जगह दी है. ताकि लोगों को पता चले की ओरिजिनल के बाद की गई एडिटिंग के पश्चात यह किताब कैसी दिखाई दी.


प्रेमचंद की दो कहानियां एक साथ : व्योमेश ने बताया कि मुंशी प्रेमचंद की सबसे महत्वपूर्ण कहानियों में एक पंच परमेश्वर और ईश्वर न्याय को भी कंपाइल करके एक किताब में हमने जगह दी है. यह पुनः प्रकाशन पहली बार था. जिसमें मुंशी प्रेमचंद की लेखनी का यह रूप सामने आया, यह भी एडिटिंग के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के पास ही गई थी. जिसमें प्रेमचंद जी ने इसका नाम पहले पंच भगवान रखा, लेकिन बाद में इसे महावीर जी ने बदलकर पंच परमेश्वर कर दिया, यह भी एडिटिंग का ओरिजिनल दस्तावेज हमने इस किताब में शामिल किया है.


हिंदी साहित्य का पुन: प्रकाशन : व्योमेश शुक्ल ने बताया, हिंदी साहित्य हिंदी पढ़ने और हिंदी समझने वालों के लिए गीता से कम नहीं है. इस किताब का पहला एडिशन 1929 में प्रकाशित हुआ था, तब से इसमें बहुत सी गलतियां चली आ रही थीं. कॉपीराइट खत्म होने के बाद 500 पब्लिशर्स ने छापा. लगभग 550 पन्ने की पुरानी किताब का अच्छे से करेक्शन करने के बाद 850 पन्नों की नई किताब दो साल पहले लॉन्च की गई. इसकी डिमांड आज भी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह पर है.


सबसे पहले सभा ने रामचरितमानस का किया था प्रकाशन : व्योमेश शुक्ल ने बताया, जो भी पांडुलिपियां या हस्तलिखित दस्तावेज हैं वह प्रमाणित हैं कि नहीं यह बहुत बड़ा सवाल है. हमारे पास इसका बहुत बड़ा दस्तावेज प्रमाण भी है. पांडुलिपियां अयोध्या, काशी नरेश के पर्सनल दस्तावेजों के साथ राजापुर और इस युग के आसपास की चीजें हमारे पास भी हैं. गीता प्रेस का एडिशन रामचरितमानस जिसे घर-घर पूजा जाता है, यह पुस्तक 1923 के पहले कहीं नहीं थी. गीता प्रेस की स्थापना 1923 में हुई, लेकिन इसके पहले 1923 में सभा ने रामचरितमानस की तुलसीदास की पांडुलिपियों को रामचरितमानस संग मानसेतर एकादश ग्रन्थ को तीन जिल्दों में प्रकाशित किया था. इसके बाद 1974 में सभा ने बड़ा काम करते हुए देशभर के विद्वानों को जोड़ते हुए उसे पुनः तुलसी ग्रंथावली के रूप में प्रकाशित किया.


Wednesday, 5 November 2025

कार्त‍िक पूर्ण‍िमा पर व‍िशेष: स्वामी हर‍िदास जी ने इसतरह गाई प्रिया प्यारे के विवाहोत्सव की मंगल बधाई

 


दिन दुल्हिन दूलहु बलिहारी 

अधिक फबीं श्री वन की स्वामिनी , देखीं न सरि की कोऊ वधू वारी ।१।

अतलस अंगिया चोली राती , पैने कुच कंचुकी उकारी ।

सारी सुरंग जरी बुँटे मणिं  , जडीं अंचल सब कोर किनारी  ।२।

भूषण वसन हू शोभा पाई  , अद्भुत रूप अंग अंग धारी ।

मोतिन मौर माथे कछु टेढ़ी  , घूँघट अँखिंयाँ चलें कजरारी ।३।

दूल्हा रूप अनूप बन्यौ ,  जामा अचकन मणि जटित किबारी ।

पेचदार पगिया पर सेहरो , मोहत मन श्यामा सुकुमारी ।४।

साजि सँवारि नाहु वधू  ललिता , हस्त मिलाप रच्यौ सुखकारी ।

प्रथम समागम कौ सुख विलसत , कृष्णचन्द्र पिया  राधा  प्यारी ।५।


प्रथम मिलन पिया प्यारी कौ गाऊँ

श्री ललिता कृपा नित जुगल लड़ाऊं ।१।

श्री वृंदावन  संपत्ति पूंजत सुख , जुगल भाव मन ध्यावै ।

सुमिरि श्री राधा चरण दासि संग  ,गौर श्याम हिय आवै ।२।

छिन छिन रस विलसत नव दंपति , निरखि सतत सुख पाऊं ।

आनंद रस न समात उमंगि उर ,सोई सखी हरखि सुनाऊं ।३।

श्री जमुना नव अम्बुज फूले , अलि अवलि दल छाये ।

गूंजत तान संगीत मृदु पवन , नव तरु द्रुमि मन भाये ।४।

सुंदर खग निरतत मन मोहक ,  मधुर पिया जस गाये ।

विविध बरन रँग  फूले सुमन दल, रुचि रुचि हार बनाये ।५।

घाटन बाटन बीथी बागन , मनहर मधुर निकाई ।

कुँज महल शुभ मिलन की बेला , हर्षित सखी समुदाई ।६।

नव वधू सरस सँवारी श्यामा ,नहिं सरि कोऊ वधू वारी ।

तैसेई सुघड श्याम दूलहु फबे ,दंपति छबि अति न्यारी ।७।

लाड़ लड़ावत वर वधू रुख लै ,सखी सहचरी प्रवीना ।

सुखद सुरति सम्पति रुचि पूंजत ,विलसैं जुगल नवीना ।८।

नैंनन नैंन जोरि झपि पलकैं ,पुनि पुनि नैंन मिलावें ।

हाव भाव बिन बैंनन सैंनन ,हँसि लजि मुरि बतरावें ।९।

रूप माधुरी चुबत अंग अंग, पीबत दृग जिय प्यासे ।

करसत मन तन भेंट अँकौ भरि,सखीं जिय जानि हुलासे ।१०। 

पारिजात संग कल्प सुमन गुहि ,कौमल सेज सजाई ।

हस्त मिलाप कराय जुग सखी ,प्रेम प्रीति पुंजवाई ।११।

गावत विरदनि गीत मिलन सखीं , मदन मोद जुग लीने ।

नव नव रति रत रसिक शिरोमणि , मिलत हू मिलत नवीने ।१२।

नित ही प्रथम समागम कौ सुख ,काम केलि नित न्यारी ।

श्री हरिदासी सखीन संग सुख, विलसत नित्य बिहारी ।१३।

आस करत आशीष देत सखीं , उर वन बसौ जुग जिय मन ।

विलसौ कृष्णचन्द्र श्री राधा , चरणदासि वृंदावन ।१४।


नवल दोऊ जागैं सारी रतियां

सुरंग सेज  सुख परे प्रथम दिन ,कोक प्रेम रस मधुरी गतियां ।१।

कबहूं कटि कटि सौं जुरि भेंटें , कबहु टटोरैं अँगुरिन छतियां । 

अधरसधर रस पान अरत बिबि , पीबत कुच मधु करि छल घतियां ।२।

झाँकत नैंन परस्पर गहरे , नैंन सैंन जानत मन बतियां । 

नव जोरी सुकुमार सलौनी , विलसत सरस सुरति सम्पतियां।३।

गावत विरदनि सखी समूह मन , पूँजत रति सुख नव दम्पतियां ।

कृष्ण चंद्र राधा चरण दासि मृदु , काम प्रेम रस पागीं मतियां ।४।

Tuesday, 23 September 2025

पूर्णिया कॉलेज में है यह 'दिनकर स्मृति कक्ष'


 बिहार के पूर्णिया जिला स्थित पूर्णिया कॉलेज में है यह 'दिनकर स्मृति कक्ष'

आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती है
'जय हो' जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को,
जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को।
किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल,
सुधी खोजते नहीं, गुणों का आदि, शक्ति का मूल।
ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है,
दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है।
क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग,
सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है, हो जिसमें तप-त्याग।

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के,
पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।
हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक,
वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।

जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी,
उसका पलना हुआ धार पर बहती हुई पिटारी।
सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर,
निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्‌भुत वीर।

तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी,
जाति-गोत्र का नहीं, शील का, पौरुष का अभिमानी।
ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास,
अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास।

- रश्म‍िरथी , प्रथम सर्ग

Tuesday, 16 September 2025

किवाड़ की खुली सांकल


 बचपन में हम देखते थे कि घर के पुरुषों के बाहर जाने पर घर की महिलाएं कभी किवाड़ तुरंत बन्द नहीं करती थी, सांकल खुली छोड़ देती थीं। कभी कभी पुरुष कुछ दूर जाकर लौट आते थे, ये कहते हुए कि कुछ भूल गया हूं और मुस्कुरा देते थे दोनों एक दूसरे को देखकर।


एक बार बच्चे ने अपनी मां से पूछ लिया कि मां पापा के जाने के बाद कुछ देर तक दरवाजा क्यों खुला रखती हो??


तब मां ने बच्चे को वो गूढ़ बात बताई जो हमारी सांस्कृतिक विरासत है। उन्होंने बच्चे को कहा कि किवाड़ की खुली सांकल किसी के लौटने की एक उम्मीद होती है। अगर कोई अपना हमसे दूर जा रहा है तो हमे उसके लौटने की उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। उसका इंतजार जीवन के आखिरी पल तक करना चाहिए! 


आस और विश्वास से रिश्तों की दूरी मिट जाती है, इसीलिए मैं दिल की उम्मीद के साथ दरवाजे की सांकल भी खुली रखती हूं, जब भी वापस आए तो उसे खटकाने की जरूरत नहीं पड़े, वो खुद मन के घर में आ जाए।


जीवन में कुछ बातें हमेशा हमे सीख देती है, कि कोई रिश्तों से नाराज कितना भी हो, उसके लिए दिल के दरवाजे बन्द मत करो। जब कभी उसे आपकी याद आयेगी, उसे आपके पास आना हो तो वो हिचके नही, मस्ती में पूरे विश्वास से बिना कुंडी खटकाए दिल के अन्दर आ जाए।


Sunday, 14 September 2025

जनरल सैम मानेकशॉ से जुड़ा एक क‍िस्सा...फील्ड मार्शल का ड्राइवर


 


जैसा कि हम जानते हैं, ये ड्राइवर आर्मी हेडक्वार्टर्स की ट्रांसपोर्ट कंपनी, धौला कुआँ, दिल्ली से चयनित आर्मी सर्विस कोर के सिपाही होते हैं।

स्वाभाविक है कि सेना प्रमुख (Army Chief) के पास अपनी सरकारी ड्यूटी के लिए एक से अधिक ड्राइवर रहे होंगे। सभी सेवा में लगे सैनिकों की तरह, ड्राइवर को भी हर साल छुट्टी लेने का अधिकार होता है। ऐसे ही एक ड्राइवर थे हरियाणा के निवासी हवलदार श्याम सिंह।

एक दिन जनरल सैम मानेकशॉ, नॉर्थ ब्लॉक में एक बैठक से हँसते हुए बाहर निकले। ड्राइवर, सख्त सावधान की मुद्रा में खड़ा था और उसने तुरंत गाड़ी का दरवाजा खोल दिया। अप्रैल का महीना था – एक सुखद, नरम धूप और हल्की हवा वाला दिन।

“तुम्हें पता है श्याम सिंह,” जनरल ने हँसते हुए कहा, “आज रक्षामंत्री ने मेरा नाम ही बदल दिया। मुझे श्याम कहकर बोले – श्याम, मान भी जाओ।”

जनरल मानेकशॉ का इशारा रक्षामंत्री बाबू जगजीवन राम की उस विनती की ओर था, जो प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कहने पर पूर्वी पाकिस्तान पर अप्रैल में हमले के लिए की गई थी। सैम ने यह कहकर मना कर दिया था कि अगर अप्रैल में हमला हुआ तो भारत को 100% हार मिलेगी।

“वैसे श्याम और सैम में ज्यादा फर्क नहीं है – बस एक H और Y का ही तो खेल है,” जनरल ने मुस्कुरा कर कहा।

जब युद्ध समाप्त हो गया और जनरल मानेकशॉ के रिटायरमेंट की तारीख नजदीक आने लगी, उन्होंने देखा कि श्याम सिंह कुछ असामान्य रूप से तनावग्रस्त रहने लगे हैं। उनके चेहरे पर बेचैनी साफ झलक रही थी, जो जनरल ने तुरंत भांप ली।

“क्या बात है श्याम सिंह, इन दिनों तुम्हारा चेहरा ऐसा लग रहा है जैसे तुम्हारे घर की भैंस ने दूध देना बंद कर दिया हो?”

“नहीं साहब, वो बात नहीं है,” और फिर वह कुछ और बोले बिना चुप हो गए।

दिन बीतते गए और रिटायरमेंट का समय करीब आता गया। एक दिन श्याम सिंह ने जनरल से कहा:

“साहब, एक निवेदन है जो सिर्फ आप ही पूरा कर सकते हैं।”

“हाँ, बोलो श्याम सिंह।”

“साहब, मैं समय से पहले सेवा से निवृत्त होना चाहता हूँ। कृपया मेरी छुट्टी की सिफारिश करें।”

“लेकिन बात क्या है? कोई ज़मीन-जायदाद का मुकदमा है या पारिवारिक परेशानी? तुम अपनी पूरी सेवा पूरी करो। मैं तुम्हें नायब सूबेदार बनवा दूँगा, लेकिन सेवा मत छोड़ो,” जनरल ने समझाया।

“नहीं साहब, बात कुछ और है, लेकिन मैं वह तब तक नहीं बता सकता जब तक सेवा से मुक्त नहीं हो जाता।”

जनरल ने उसकी साफगोई और इज़्ज़त की भावना को समझा और आवश्यक कार्रवाई कर दी। जब ड्राइवर की रिहाई के आदेश आ गए, जनरल ने फिर पूछा:

“अब तो खुश हो? अब बताओ क्यों जल्दी रिटायर हो रहे हो?”

ड्राइवर सावधान मुद्रा में खड़ा हो गया और बोला:

“साहब, आपकी गाड़ी चलाने के बाद मैं किसी और की गाड़ी नहीं चला सकता। यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान था। मैं इसी इज़्ज़त के साथ घर जाना चाहता हूँ।”

फील्ड मार्शल हँसे और बोले:

“तू बहुत बड़ा बेवकूफ है! तुम हरियाणवी लोग भी ना – एकदम ज़िद्दी और पक्के”

लेकिन अब जब छुट्टी के काग़ज़ बन चुके थे, कुछ नहीं किया जा सकता था। वह तो ठेठ हरियाणवी था – जो मन में ठान ले, फिर पीछे नहीं हटता।

फिर भी जनरल ने एक दिन उससे पूछा:

“रिटायरमेंट के बाद क्या करेगा?”

“कुछ न कुछ कर लूंगा साहब, कोई नौकरी ढूंढ़ लूंगा।”

“तुम्हारे पास खेती की ज़मीन कितनी है?”

“कुछ भी नहीं साहब, मैं तो गरीब परिवार से हूँ।”

जनरल सन्न रह गए। एक निर्धन व्यक्ति, जिसने सिर्फ इसलिए नौकरी छोड़ दी क्योंकि वह किसी और की गाड़ी नहीं चला सकता था।

जिस दिन ड्राइवर विदा हुआ, सैम मानेकशॉ ने उसे एक लिफाफा दिया।

“श्याम सिंह, इसे घर जाकर ही खोलना।”

“जी साहब।” ड्राइवर ने सलाम किया और चला गया।

घर पहुँचकर वह नौकरी ढूँढ़ने में व्यस्त हो गया और लिफाफा भूल ही गया। एक दिन उसे माल ढोने वाले ट्रक की ड्राइवरी का काम मिल गया। फिर एक दिन उसकी पत्नी बोली:

“मैं तुम्हारी आर्मी की वर्दी संदूक में रख रही थी, ये लिफाफा तुम्हारी जेब में मिला।”

“अरे, इसे तो मैं भूल ही गया था। मैंने इसे नहीं खोला क्योंकि मुझे ज्यादा पढ़ना- लिखना नहीं आता।... साहब ने शायद मुझे एक प्रशंसा पत्र दिया होगा, जैसे बड़े अफसर देते हैं।”

“फिर भी, इसे खोलो और स्कूल मास्टरजी से पढ़वा लो, मैं जानना चाहती हूँ इसमें क्या है।”

तो दोनों पति-पत्नी गाँव के स्कूल गए और हेडमास्टर से निवेदन किया कि वह पत्र पढ़कर सुनाएँ।

मास्टरजी ने चश्मा पहना, लिफाफा खोला और काग़ज़ को देखकर चुपचाप रह गए।

“क्या हुआ मास्टरजी, ऐसे क्या देख रहे हैं?” श्याम सिंह ने पूछा।

“क्या तुम्हें पता है ये क्या है?”

“नहीं साहब।”

“यह एक हस्तांतरण पत्र (transfer deed) है।

1971 की जीत के बाद हरियाणा सरकार ने फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को 25 एकड़ ज़मीन युद्ध जागीर के रूप में दी थी।

उन्होंने वह सारी ज़मीन तुम्हारे नाम कर दी है। अब तुम 25 एकड़ के मालिक हो।”

यह सुनकर पत्नी ने गुस्से में पति को डाँटा:

“तू तो पूरा बेवकूफ निकला! मैं तो इस लिफाफे को चूल्हा जलाने के लिए जलाने ही वाली थी!

भगवान का शुक्र है मैंने पहले पूछ लिया!”

इस तरह यह कहानी है महान जनरल सैम मानेकशॉ की – जिन्होंने अपनी युद्ध जागीर सोनीपत के पास अपने ड्राइवर को दे दी और अपनी फील्ड मार्शल की पेंशन आर्मी विडोज़ वेलफेयर फंड को दान कर दी।

- अलकनंदा स‍िंंह (आजकल रोज एक कहानी पढ़ रही हूं) 

Friday, 5 September 2025

कड़ाह में तलीं, झारियों पर सजीं भंडारे की पूड़ियां


 



यह प्रसिद्ध वाक्य, "भंडारे की पूड़ियों पर किसी को प्रबंध-काव्य लिखना चाहिए!", हिंदी के महान कवि और लेखक रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा था, जो उनकी व्यंग्यात्मक और सामाजिक टिप्पणी को दर्शाता है कि कैसे लोग सामान्य चीज़ों (जैसे भंडारे की पूड़ी) में भी आनंद और महानता खोज लेते हैं, और इन पर महाकाव्य लिखे जा सकते हैं. 

ये लीज‍िये द‍िनकर द्वारा ल‍िखा गया पूरा लेख-----

भंडारे की पूड़ियों पर किसी को प्रबंध-काव्य लिखना चाहिए! लोक में उनकी आसक्ति और प्रभाव इतने व्यापक जो हैं। वे घर में बनाई जाने वाली पूड़ियों से थोड़ी पृथक होती हैं। किंचित लम्बोतर, ललछौंही-भूरी, मुलायम, अधिक अन्नमय, और व्यापक जनवृन्द के क्षुधा-निवारण के प्रयोजन में सिद्ध। 

बहुधा भंडारे की पूड़ियों में घर की गोलमटोल पूड़ियों सरीखे पुड़ नहीं होते, वे अद्वैत-भाव से ही आपकी पत्तल में सिधारती हैं। यों पूड़ी शब्द की उत्पत्ति ही पुड़ से हुई है- जैसे सतपुड़ा यानी सात तहों वाला पर्वत। पूड़ियाँ बेलते समय तो आटे की लोई एक ही पुड़ की, समतल भासती हैं, पर तले जाने पर उसमें दो पुड़े फूल आते हैं। पहला, बाहरी पुड़ा महीन और कोमल, जो जिह्वा को लालायित करता है, और दूसरा, आभ्यन्तर का, अन्न के सत्त्व को अपने में सँजोए, जिससे क्षुधा का उन्मूलन होगा!

किसी धर्मशाला के कक्ष में रसोई करने वाली स्त्रियों द्वारा तारतम्य के संगीत से बेली और तली जाने वाली पूड़ियों का मन को स्निग्ध कर देने वाला दृश्य कभी निहारिए! और फिर पूड़ियों की मियाद चुक जाने पर जूठे हाथ लिए बैठे उसकी बाट जोहते भंडारा-साधकों को देखिए। महाअष्टमी-महानवमी में तो यह पूड़ी-प्रसंग भारत-भूमि में यत्र-तत्र-सर्वत्र सजीव हो उठता है। भंडारों की रामभाजी और पूड़ी पर समस्त संसार का अन्नकूट निछावर है!

मैदा की पूड़ी लचुई या लूची कहलाई है। यह विशेषकर बंगभूमि में प्रचलित है। अवध में यही सोहारी कहलाई है। पूड़ियों का एक रूप बेड़ई या कचौड़ी है, वह उत्तर-मध्य भारत में बनने वाली मूँगदाल की कचौड़ी से भिन्न है। कुछ पूड़ियाँ तो पुरइन के पत्ते जैसी लम्बी-चौड़ी भी होती हैं। भोजपुर-अंचल में वह हाथीकान पूड़ी कहलाई है। यह बड़ी मुलायम होती है और एक पखवाड़े तक ख़राब नहीं होती।

मैं कहूँगा, भारत के निर्धनजन की राम-रसोई में पहली इकाई है- रोटियाँ। सेंक के भूरे-कत्थई ताप-बिंदुओं से सज्जित, किंतु बहुधा बिना घृत-लेपित। उन पर प्रगतिशील कवि-लोग बहुत काव्य रचते हैं। जिस दिन निर्धन का मन इठलाता है, उस दिन वो रोटियों के वर्तुल को त्रिभुज से बदलकर सेंक लेता है पराँठे। किंतु पूड़ियाँ? वे तो पर्वों-उत्सवों का मंगलगान हैं। भारतभूमि में पूड़ियाँ पर्व का पर्याय हैं। पूड़ियाँ नहीं तो पर्व नहीं। पूड़ियाँ तली जा रही हैं तो पर्व ही होगा, कुछ वैसा ही वह संयोग है। वे हिंदू-पर्वों की स्नान-ध्यान वाली सत्त्व-भावना को व्यंजित करती हैं- हल्दी और अजवाइन की पीताम्बरा पूड़ियाँ तो सबसे अधिक!

पूड़ियों की जो सबसे मधुर स्मृति मेरे मन में है, वह इस प्रकार है- अगस्त का महीना! नागदा-दाहोद लाइन पर बारिश की सुरंग के भीतर दौड़ती रेलगाड़ी! फिर मेघनगर में किकोरों के सावन के मध्य उतरना। वहाँ से बस पकड़कर झाबुआ जाना, जहाँ दाहोद से मेरी बुआ राखी मनाने आई होती थी। बुआ हाथ में मेहंदी लगाती थी। मेहंदी रचे हाथ से पूड़ियाँ मुझे खिलाती थी।

संसार में कोमलता का इससे सुंदर चित्र कोई दूसरा नहीं हो सकता कि कोई स्त्री मेहंदी लगे हाथों से आपको पूड़ियाँ खिलाए!

तब इसका क्या करें कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को गर्म नहीं ठंडी पूड़ियाँ ही भाती थीं। कवि अज्ञेय ने स्मृतिलेखा में बताया है कि चिरगाँव में जब भी पूड़ियाँ बनतीं, वे बैठक से ही आवाज़ देते कि चार-छह पूड़ियाँ अलग रखवा देना। इन्हें वे अगली सुबह खाते। कहते कि बासी पूड़ी के बराबर कोई स्वाद नहीं जान पड़ता है।

ऐन यहीं पर मुझको एक पुरानी हिंदी फ़िल्म का संवाद याद आ रहा है, जिसे गुज़रे ज़माने के अभिनेता गोप ने अपनी अदायगी से तब ख़ूब मशहूर बना दिया था। संवाद कुछ यों था- 

"बड़े घरों की औरतें सुबह-सवेरे क्या करती हैं? अजी कुछ नहीं, बस आम के अचार से बासी पूड़ियाँ खाती हैं!"

यह तो हुई बड़े घरों की बात। और छोटे घरों-संकुचित हृदयों की अंतर्कथा? वह प्रेमचंद ने बतलाई है। बूढ़ी काकी- जो पूड़ियों के प्रति अपनी तृष्णा से भरकर जूठी पत्तलों से उनकी खुरचन बटोरकर खाने लगी थीं, जिसे देखकर सन्न रह गई थी गृहस्वामिनी।

ये सब लोक में, आख्यान में, सामूहिक-स्मृति में प्रतिष्ठित पूड़ी-प्रसंग हैं। जनमानस से एकाकार। गृहणियों के मन का प्रफुल्ल-उत्सव। पूड़ियाँ न होतीं तो पर्व नहीं हो सकते थे, पर्व मनाने वाले मन पुलक से नहीं भर सकते थे- तिस पर कड़ाह में तलीं, झारियों पर सजीं भंडारे की पूड़ियों की तो बात ही क्या। 


- द‍िनकर की पूड़‍ियों पर फ‍िदा--- अलकनंदा 'पूड़ी बाज' 

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